गुल्लू भैया

1।06।2019
गुल्लू की आंखें सदैव मुझ में खुद को देखती रही है मैने निश्चय किया है गुल्लू को ऐसी शिक्षा दिलवाऊंगा जो उसे हीरो बना दे। मेरे प्रति गुल्लू का विश्वास हमेशा मैंने उसकी आंखों में देखा है शिक्षा के लिए भेजते समय मैं कितना रोया मुझे नही पता परन्तु जिम्मेदारी के अहसास आंसू निगल ही जाते हैं।
गुल्लू बहुत रोयेगा जब मैं उसे छोड़ के आऊंगा ,दुखी तो मैं भी बहुत होऊंगा ,घर में सब उसे एलेक्स बुलाते हैं मैने उसका नाम गुल्लू रखा है मेरा बेटा गोलू उसे बड़े प्यार से ले के आया था इसीलिए बेटे के नाम पे गुल्लू नाम रखा जिससे गोलू की कमी हमे कभी महसूस न हो,पर क्या पता था कि नियति मुझे एक दिन तलवार की धार पे खड़ा कर देगी एक तरफ पिताजी और एक तरफ गुल्लू , समाज उसे कुत्ता कहता है पर माँ ने शुरू से कहा इसे घर लाया है तो इसमे ब्रह्म को देख के पालना, दुखी माँ भी है पर पिताजी और गुल्लू के बीच 36 का आंकड़ा माँ भी समझती हैं। इसीलिए मैंने निर्णय लिया गुल्लू को होस्टल में रख के पालूंगा।
3 बच्चे बड़े करके हमने सोच लिया कि जीवन का एक अध्याय पूरा, पर क्या पता था नियति गोलू-बेटा के माध्यम से गुल्लू को मुझे दे के गुल्लू का जीवन मेरे साथ जोड़ देगी, समाज कहता है उसे छोड़ दो धर्म कहता है गुल्लू की आंखों में शरणागत के भाव का अपमान मत करना, धर्मराज के साथ कुत्ता ही तो स्वर्ग गया था बाकी और के तो शरीर गल गए थे या जल गए थे।
मन बोझिल है सच कहूँ तो जीवन में मैंने प्यार को जिम्मेदारी समझ निभाया पर गुल्लू ने प्रेम का सही अर्थ समझाया, एक ऐसा प्राणी जो इंसानी भाषा नही समझता वो प्रेम का दर्शन शास्त्र पूरा पढ़ा चुका था मुझे, ऐसी ब्रह्मात्मा को असुरक्षित छोड़ना एक अपराध होता इसीलिए मैंने गुल्लू के ट्रेनर अशोक जी को उचित व्यक्ति समझा और उन्हें जिम्मेदारी दी वे गुल्लू का भला-बुरा दोनो सही से समझते हैं साथ ही गुल्लू उनसे परिचित भी है, अशोक जी का बेटा भी अनुशासन एवं स्नेह दोनो बाते समझता है अशोक जी की तरह, अतः इन दोनो पिता-पुत्रों से अंधिक उत्तम विकल्प मेरे पास नही है, अशोक जी का होस्टल गुल्लू के दूसरे घर की तरह ही है मेरे लिए।मैंने 2 दिन गुल्लू से बात नही की और जब उसे यहां देखा तो मैं खुद को रोक नही पाया और उसके साथ खेल कर उसकी उदासी दूर कर दी, इतना उदास गुल्लू को मैने 18 महीने में कभी नही देखा । उफ़्फ़फ़अशोक जी ने बातों-बातों में कहा था श्वान ही मेरी जीविका के साधन हैं जो बताता है कि अशोक जी का अपने पेशे के प्रति कितना सम्मान है जब व्यक्ति अपने पेशे पर गर्व करता है तो ईमानदारी उसके कार्य में आ ही जाती है ऐसा होना स्वाभाविक है। अतः निश्चिंत होकर अशोक जी को गुल्लू का लालन-पालन सौंप रहा हूँ।
गुल्लू बेहद संजीदा और प्यार भरा है बशर्ते हमारा व्यवहार भी वैसा हो , गुल्लू आंखों से मुझे पढ़ने की कला में माहिर है उसे होस्टल भेजने की कशमकश उसने कुछ दिनों से शायद भाँप ली है जिसके कारण उसका शरारती अंदाज कुछ कम हो उदासी से भर गया है जो मुझे भी उदास कर देता है ईश्वर से यही प्रार्थना है कि जीवन का यह यज्ञ सफलता से पूरा कर पाऊं, पत्नी जो अक्सर गुल्लू की शैतानी से तंग आकर गुल्लू को डांट देती है कह रही है उसे भी गुल्लू का नया घर देखना है।
प्रेम अविरल भाव से निर्झर झरने की तरह सबके लिए समान रूप से बहता है यही प्रेम का पूर्ण स्वरूप है।इंसानी सभ्यता इसे खांचों में बांटने की कोशिश कर केवल स्वयं के लिए रखने की मूर्ख अपराधी है क्योंकि जब झरना सूखता है तो सबके लिए ही सूखता है।।।03।06।2019गुल्लू को आज होस्टल अशोक के पास छोड़ के आया ,कुछ अपना हिस्सा अलग सा हुआ , घर वापस लौटने के आसार उसके बेहद कम हैं कब तक ऐसे ही उसका आर्तनाद सुनना होगा, पता नही , एक हिस्सा संभालूं तो एक छूट जाता है,मेरे जीवन में ऐसा अक्सर होता आया है,कंचन,चिंकी,मिन्की,गोलू सब उदास हैं ।
अब सुबह की चाय पर गुल्लू साथ नही होगा , न होगी उसकी नटखट शैतानियां ,दौड़ के खेलना ,मुझ से चिपकना।
पता नही पिता जी क्यों नही नियंत्रित कर पाए अपना क्रोध जिसने उनका गुल्लू से आंकड़ा 36 का बना दिया ।
स्नेह से पगा गुल्लू एक झटके में खलनायक बन गया ,जब भी उसकी याद आती है आंखें भर जाती हैं हृदय के स्पंदन भारी हो जाते हैं ।शाम को लौटते समय गुल्लू से मिलने गया वो खुशी से उछल गया लिपट गया ,टाटा किया तो रोने लगा ,अशोक ने मना किया तो शांत हो विदा किया उसने , पर आंखों में दर्द साफ था, वाशरूम के बाहर भी मेरे निकलने का इंतजार करने वाले को आज मुझ से दूर होना कसक रहा था ।एक दो दिन में नार्मल हो जाएगा, दोस्तों के साथ , आज घर जरूर उदास है न उसकी शैतानी, न रूठ कर रोना, न जाली पर पंजे मार के दरवाजे खोलने की जिद करना ,न दरवाजे पर खड़े होकर मेरा इंतजार करना ,न गाड़ी में बैठ कर गेट से अंदर आकर खुशी से कूदना।अपने बेहद प्यार भरे बच्चे को अलग करने पर समाज मुझे बधाई दे रहा है ,हंसू या रोऊँ मानव समाज की अमानवीय मानवता पर , समझ नही आ रहा ?? हाथी मेरे साथी फ़िल्म की कहानी मेरे जीवन मे सच हो घटित हो जाएगी मैंने कभी कल्पना नही की थी।04.06.19आज की सुबह बेहद फीकी गुल्लू के बिना, बगीचे की सफाई आज भावशून्य कार्य यांत्रिक कार्य था पहले गुल्लू खेलेगा इस भाव से सफाई करता था, सफाई करते समय गुल्लू मेरे साथ अपनी नटखट शैतानी करता रहता था, कंचन बोली बगीचे की शोभा नही रही और अब में दिन भर करूंगी क्या ,किससे बात करूंगी , कंचन गुल्लू के रौद्र रूप से डरती तो है पर उससे स्नेह भी उसे उतना ही है अपने लिए निकाली मलाई में से गुल्लू को रोटी के साथ देना वो नही भूलती थी।अब बगीचा न गुल्लू के फटे अखबार से सजा मिलेगा न उसके खेलने की पाइप गुल्लू के द्वारा संभाल कर शरीफे के पेड़ के नीचे रखी मिलेगी, गुल्लू अपना खेलने का सामान ऐसे ही शरीफे या आम के पेड़ के नीचे संभाल कर रख दिया करता था।झीने में खड़े हो के आधी जीभ किनारे से बाहर निकाल के शरारत और खेलने की आशा से खड़ा गुल्लू बहुत मासूम सी भावभंगिमा में जब मुझे बुलाता तो मेरी दिनभर की थकान एक पल में उतर जाती, गुल्लू की प्रत्येक शरारत जब याद करता हूँ तो आंखें भरे बिना नही रहती।घर के प्रत्येक कोने में आनंद अनुभूत करता गुल्लू आज मानवीय घाव से परास्त हो न दिखने वाले घावों से भरा दूर कहीं जीवन जी रहा है साथ ही हम मजबूर हैं समय के इस परिवर्तित आयाम के साथ गुल्लू के दुख को महसूस करते हुए। गुल्लू जहां भी हो खुश रहना हम आते रहेंगे मिलने।आम , पपीता और तरबूज गुल्लू को बहुत पसंद हैं आज जब कंचन ये ले के आई तो आंखें भर आईं और बिल्कुल मन नही हुआ इसे खाने का अब जब जाऊंगा तो गुल्लू के लिए एक आम,एक पपीता और एक तरबूज जरूर ले के जाऊंगा ।आज मिलने गया था गुल्लू से उदासी गायब थी देखते ही लिपट गया, सहलाने के बाद सामान्य हुआ, पपीते की खुशबू उसे शायद आ गई थी अतः उसने थैली को खींचने का प्लान बनाया हम समझ गए पपीते देख गुल्लू भैया सब भूल जाते हैं 😂😂 पेट भर पपीता खाने के बाद पैरों के पास बैठ हमारे पंजे चाटने लगा और आँखों में स्नेह के बादल लिए हमे एकटक देखने लगा उसका आशय समझ हम उसकी गर्दन सहलाने लगे, ऐसा करवाना गुल्लू को बहुत अच्छा लगता है।गुल्लू शायद अब समझदार होने लगा है ।
गुल्लू भैया सुबह शाम दौड़ लगाते हैं और फिर थक के जब खाना मिलता है तो उसके बाद पैर पसार के सो जाते हैं।😘😘😘06।06।2019आज सुबह की चाय फिर अच्छी नही लगी, गुल्लू का दूध-रोटी खाना हमारी चाय के साथ एक भावनात्मक संबंध था, दूध-रोटी खाने से पहले वो मुझे देखता प्रश्न के साथ कि दूध-रोटी खा लूं तो घुमाने ले चलोगे न 😘😂06।06।2019 17.00 hrsऑफिस से घर आया तो गेट पर चला गया ,फिर ध्यान आया गुल्लू तो है नही, दो बूंदे आंखों में फिर आ गईं, गुल्लू को मेरे आने पर मेरा स्वागत गले मिल कर करना अत्यंत प्रिय है, सुबह और शाम का नाश्ता उसे मेरे साथ करना प्रिय है। कितना भी व्यस्त रहूं गुल्लू भैया आ ही जाते हैं, धर्म के चौराहे पर खड़ा हूँ जहां जिम्मेदारी दोनो तरफ बराबर न्याय मांग रही हैं, पिता के प्रति कर्तव्य और गुल्लू भैया का शरणागत होने का भाव।😥😥गुल्लू भैया परिवार का अभिन्न अंग बन के रहना चाहता है ये बात परिवार के कई लोग समझ नही पाए, गुल्लू का स्नेह तिरस्कृत होता है तो वो उदास हो के शैतानी से पैर पटकने लगता है फिर भी नही ध्यान दो तो गुस्सा हो के मुंह फेर लेता है उसकी ये भावभंगिमा मुझे स्नेह से भर गुल्लू को गोद मे आने का संदेश देने पर मजबूर कर देती है। अब गुल्लू भैया अकेले हैं मानव समाज के इस दोषा रोपण के साथ कि उसे समझ कम है 🙄 एक प्रश्न शास्वत है कि समझ की निपुणता ईश्वर ने गुल्लू को दी है या हमे ?? अक्सर गुल्लू के बिना शर्त स्नेह के सामने में स्वयं को बहुत बौना पाता हूँ।गुल्लू भैया के हजारों प्रयत्न मानवीय स्वार्थ जनित अहम की दहलीज पर दम तोड़ चुके थे और गुल्लू भैया कलंकित हो रहे थे, मैं स्वयं गुल्लू भैया को इस बात के लिए अकेला जवाबदेह नही मानता यह बात गुल्लू भैया शायद समझते हैं इसीलिए दो दिन उसने मुझ से नजरें नही मिलाई एवं चुपचाप बगीचे में भारी गर्मी में ही बने रहे, अंदर आने को कहा तो गुल्लू के पैर कांप रहे थे जिसने मुझे भरभराकर रोने पर विवश कर दिया। ईश्वर पिता जी का जीवन और गुल्लू भैया का स्नेह परिवार के साथ रखे बस यही प्रार्थना नीम करौली वाले बाबा से,जो मैं दिन-रात करता रहता हूँ।08.06.19आज गुल्लू से मिलने गया था गुल्लू के चेहरे पर आनंद था, गुल्लू के छोटे दोस्त की दोस्ती गुल्लू को उदासी से बाहर निकाल चुकी थी, अशोक जी ने बताया जिस दिन आप पपीता खिला के गए थे उंस दिन गुल्लू ने आपको बहुत याद किया और शाम को भोजन भी अल्प मात्रा में किया 😘😘 गुल्लू की डिग्री क्लास की पढ़ाई के लिए अब समय अंतराल बढ़ाना पड़ेगा, अशोक जी से कहा है एडवांस कोर्स गुल्लू कर लेगा क्या तो वे बोले कर लेगा ,हमने कहा जितनी भी विद्या आपके पास है गुल्लू को दे दीजिए। कल रविवार है गुल्लू की हेयर कटिंग होगी आने वाले वर्षा के मौसम में उमस उसे परेशान न करे इसीलिए।गुल्लू को आम खिलाया ,मुश्ताक काट रहे थे और हम खिला रहे थे आम कट के समाप्त हुआ तो मुश्ताक के जब हाथ खाली हो गए तो गुल्लू भैया मुश्ताक पर गुर्रा दिए 😂😂😂😂 (एक ही आम क्यों लाये) मुश्ताक हंस के बोले आगे से दो आम ले के आऊंगा बाप 😂😂😂😂😂😂09.6.19गुल्लू भैया को तेज़ आवाज बिल्कुल पसंद नही है साथ ही न उसे अलग होने को कहना पसन्द है, मैं नाराज हो के जब गुल्लू को कहता कि चलिए बाहर जाइये तो गुल्लू भैया आंखें एवं सिर झुका के खड़े रहते बाहर नही जाते फिर धीरे से सिर उठा के आँखों मे सवाल लिए होते, “हमने कुछ गलत कर दिया क्या” इस समय वो इतने मासूम होते कि हम गुस्सा होते हुए भी उन्हें बाहों में भर लेते।अम्मा के पास वो दूर ही बैठते थे अम्मा उन्हें चार बजे बिस्किट खाने को देती हैं ,समय होते ही वे पहुंच जाते, तख्त पर यदि अम्मा लेटी होतीं तो वे अपनी आवाज से उन्हें जगा लेते, अम्मा कहती आ गए गुल्लू , लो बिस्किट , बिस्किट खा के गुल्लू भैया चल देते, हम अगर लेटे होते हैं तो गुल्लू भैया हमारे ऊपर आ के सो जाते हैं पर अम्मा के तख्त से भी उन्होंने कभी हाथ नही लगाया, दूर ही बैठते, शायद अम्मा के लंगड़ा के चलने के कारण गुल्लू भैया समझते हैं, पिता जी हमेशा गुल्लू भैया को निकलो बाहर कहते हैं जो गुल्लू भैया की आंखें सफेद कर देता है , पिता जी का अम्मा पर चिल्लाना तो गुल्लू भैया को सिरे से पसंद नही है, जब भी पिता जी अम्मा से उंगली दिखा के जोर से बात करते हैं तो गुल्लू भैया पिता जी के प्रति आक्रामक हो जाते हैं कई बार हमने अपना हाथ गुल्लू भैया के मुह में फंसा कर पिता जी को बचाया पर पिता जी ठहरे पिता जी।हमने कई बार पिता जी को कहा कि आपका अहम और गुल्लू भैया की संवेदनशीलता में बहुत अंतराल है इसे भरिये पर पिता जी नही माने फलस्वरूप पिता जी गुल्लू भैया की नजरों में चढ़ गए हैं ।प्रश्न:- समाज कहता है जानवर को आक्रामक नही होना चाहिए पर इंसानी अहम का क्या जो आग में घी का काम किये बिना नही मानता ?अम्मा या कंचन के प्रति गुल्लू भैया का व्यवहार नरम है इन दोनों से तेज आवाज में बात करना गुल्लू भैया को कतई पसंद नही।12.06.19
दो दिनों से बहुत व्यस्त था पर गुल्लू भैया हमेशा साथ थे एक पल को भी उन्हें भूल नही पाया था,शाम घर 11 बजे पहुंच पाया गाड़ी से उतर गेट खोलने आया तो गुल्लू भैया को गेट पर न पाकर आंखे नम हो गईं, गुल्लू भैया को मेरे आने पर गाड़ी में बैठ घर आना अत्यंत पसंद है ,गाड़ी में बैठते ही गुल्लू भैया को मानो सारे जहां की खुशियां मिल जाती हैं । सोने से पहले कंचन ने कहा शनिवार को वो गुल्लू से मिलने जाएगी ,समझता हूँ कैसे कंचन के दिन बीत रहे हैं और शनिवार तक की दूरी पहाड़ सी बन गई है ।13.06.19बगीचे में पानी भरा है पत्तों से पटा पड़ा है ,साफ करने का मन ही नही हुआ, बगीचे का राजकुमार जो नही है, किसके लिए साफ करूँ, गुल्लू भैया को पत्ते से भरा नही अपितु साफ बगीचा पसंद है , पत्ते से बगीचा भरा होने पर गुल्लू भैया बहुत नाराज होते हैं ।16.06.19आज कंचन गुल्लू भैया से मिलने गई थी मेरे साथ, गुल्लू भैया को अशोक ने नहलाया था गीले शरीर पर हवा की ठंडक थी, हमे देखते ही गुल्लू खुश हो गए उनकी नेत्र पीड़ा-खुशी के मिश्रित आंसुओं से भरे थे, मेरा पुत्रवत व्यवहार गुल्लू से मुझे गुल्लू की हर बात बता देता है, गुल्लू भी जानता है ये बात। गुल्लू एवम मेरा संवाद आंखों की भाषा से हो जाता है। आज फादर्स डे की बधाई सब दे रहे हैं पर हम सुबह से मन ही मन रो रहे हैं मेरा सबसे प्यारा बच्चा मेरे पास नही है। राजा दशरथ का पुत्र-वियोग महसूस होने लगा है। पर हम साहस नही तजेंगे गुल्लू भैया के साथ धर्म आधारित न्याय अवश्य करेंगे। हम जानते हैं कि गुल्लू भैया ने कैसे हमे गहरे अवसाद के अंधेरों से निकाल सामान्य जीवन दिया है।23.6.19आज पीछे मुड़ के देखा तो समय-संकेतों के अवशेष पुकारते मिले, जो कब से कह रहे थे मौन हो जा , मैने ही अनसुना किया जिसका फल भुगत रहा हूँ। अब मौन हूँ जिसमे मेरे एवम गुल्लू के सिवा कोई नही ।2.7.19गुल्लू भैया की आंखें बहुत बोलती हैं पर आज उसकी आँखों मे ठहराव देख कर कुछ मरता हुआ सा महसूस हुआ , गुल्लू भैया की मस्ती, खिलाडी भाव कुछ नही दिख पाया उसकी आँखों मे , आम ले गया था आम बहुत प्रेम से खाता है गुल्लू भैया , जब से गुल्लू घर से गया है मुझे आम देख के बहुत बुरा लगता है, हमने आम खाना लगभग छोड़ ही दिया है ।गंगा माँ सबके मनोरथ पूर्ण करती हैं , हरिद्वार गया था 30.6.19 को , गंगा मैया से हमने केवल मांगा है,हे माँ गुल्लू भैया एवम पिताजी के बीच का झगड़ा समाप्त कर दीजिए, आशा है माँ गंगा मेरी सहायता करेंगी। पत्नी मुझे हरिद्वार किसी और प्रयोजन से ले गई थी पर जब भी मां गंगा का स्वरूप सामने आता हम केवल। गुल्लू भैया एवम पिताजी के झगड़े को समाप्त करने के सिवाय कुछ नही मांग पाए।6.7.19/7.7.19आज हम गुल्लू भैया से मिलने गए थे उसकी आंखें हमेशा पूछती है घर कब ले चलोगे, कालेज मुह में आ जाता है हम गुल्लू भैया से नजर नही मिला पाते ,आज पूरा दिन बेहद उदास बीत गया ,रात लगभग 3 बजे आंख खुल गई थी गुल्लू को सपने में अपने पेट पर लेटा महसूस किया था

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बक्सा बुद्दू या हम

बक्सा बुद्दू या हम

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2002 me so gayaa

2002 me so gayaa

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विनम्रता भर मुझे देना

हासिल कोई मुकाम कर लूँ , हासिल इस से क्या होगा |

दिया कोई रोशन कर दूँ , प्रकाश वो सब को देगा ||

स्वाभिमान जगाने की मुहिम , करवटें सदा लेती रहीं हैं |

स्वाभिमान लुटा दूँ , किसी में तो घर ये करेगा ||

 सोते हुए स्वाभिमानो की , खुमारी चढ़े न सर मेरे |

कान्हा ‘’मेरे’’ इतनी सी , विनम्रता भर मुझे देना ||

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उत्तराखंड विप्लव की पृष्ठभूमि में….’

उत्तराखंड विप्लव की पृष्ठभूमि में….’

‘’ सामाजिक मीडिया पर जनता की आवाज कुछ इस तरह गूँज रही है “

हिन्द को नाज था वो पेप्सी कहाँ है , दुनिया कर के मुठ्ठी में वो सोये कहाँ हैं

कहाँ है वो मिलिनेयर और बिलिनेयर कहाँ हैं ,100 करोड़ की फीस वाले कहाँ हैं

कैसे इस विपदा से निपटेगा हिन्द अब बता दो ,निरपेक्षता के रक्षक सोये जहां हैं

छपते हैं समय के पृष्ठों पर दिलकश अदा से ,वो इठलाते चहरे छुपे अब कहाँ हैं

पुकार प्रथम रक्षक की सुनते क्यों वो नहीं हैं ,प्रथम रक्षक के कथित-दोस्त अब कहाँ हैं

सुनो रक्षक प्रथम उनसे ना तुमको ,सौगात कुछ मिलेगी

मदद की तो छोड़ो , बात भी ना अब वो करेंगे ,

दिन भर देते जो उपदेश वो मनीषी कहाँ है , स्तम्भ हैं चौथे पर मौन-आसन उनने लगाया 

नैय्या आम आदमी ही पार आपकी करेगा , टेक्सों से जिसको लादा है तुमने

समझते हैं परेशानी आपकी प्रथम रक्षक जी===

 ‘’’ आपदा के समय सदा आपको हमारे दूधवाले भैय्या के चेहरे में

   दुनिया का सबसे बड़ा उद्योगपति जो दिखने लगता है “’

दूधवाले भैय्या के नाम पर बोलो

//// पटिया वाले बाबा की जय  \\\\\\\\\\

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‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ जिसे विश्व अपना रहा है हम उस से दूर जा रहे है मात्र कुछ त्वरित स्वार्थ-पूर्ती की लालसा में सम्पूर्ण जन-मानस को गलत राह दिखा कर ?

‘’सीमित होती निरपेक्षता और भारत का सम्मान ‘’

भारतवर्ष को सम्मान सदैव उसके ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ के विचार को प्रचारित एवं तदनुसार जीवन में उतारने के कारण मिला है, इस सम्मान का दूसरा दारुण पक्ष यह भी की सदियों से विश्व ने भारत-भूमि का प्रयोग विभिन्न विचारों के प्रतिपादन एवं स्थापन में एक प्रयोगशाला के रूप में किया और कर रहा है | सैकड़ों सालों के असंख्य प्रयोगों के उपरांत भी ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ का सर्वोच्च निरपेक्ष विचार जन-मानस में वैसा का वैसा ही है , इस विचार की सर्वग्राहिता ही वह अन्तर्निहित ताकत है जो वैदिक सभ्यता को आज भी विश्व के मानचित्र पर उसी तीव्रता से प्रदर्शित कर रही है, जबकि ऐसे कुछ वर्षों के प्रयोग के बाद ‘’रोम’’ जैसे विशाल राज्य की सत्ता अंतिम समय में केंद्र में सिमट समाप्त हो गई और रोम की विशाल सत्ता का नामो-निशाँ एक दर्दनाक कहानी के रूप में इतिहास के पन्नो में दर्ज हो गया |

समय शायद यही कह रहा है कि निरपेक्षता की सीमित हो चुकी परिभाषा को अब समाप्त हो ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ की सर्वव्यापी , सर्वकल्याणकारी परिभाषा को स्थापित होना है | केवल कुछ लाभों की प्राप्ति भर के लिए मूल सिद्धांतों में तोड़-फोड़ सदैव से होती आई है और भारतीय जन मानस ने समस्त पूर्वाग्रहों से दूर जा कर ‘’ भारतीयता ‘’ को सदैव स्थापित भी किया है , परन्तु इतिहास और समय कभी भी मूल नैसर्गिक सिद्धांतों से तोड़-फोड़ करनेवालों को माफ़ नहीं करता , शायद यही वजह रही जिसने सिकंदर को अंत समय में अहसास दिलाकर मजबूर कर दिया की वो अंतिम सन्देश मूल नैसर्गिक सिद्धांतों की परिभाषा के अंतर्गत दे कर दुनिया से विदा ले |

परन्तु प्रश्न यह है की सिकंदर का अंतिम सन्देश भुला कर अहमक-निर्णयों में उस से भी आगे निकला जा चुका है क्या ?

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‘’निरपेक्षता के बदलते अर्थों ने क्या इसके नए वर्गीकरण की आधारशिला रख दी है “?

वैदिक साहित्य की पृष्ठभूमि में जितने भी लेखकों ने लिखा, चाहे वो स्वदेशी हो या विदेशी सब ने वैदिक विचारधारा के ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ को सदैव सम्मानित पद दे कर रेखांकित किया है | यह वो शब्द है जो विचारधारा के उस सम्पूर्ण स्वरुप को आकार देता है जो धर्म-निरपेक्षता,क्षेत्र-निरपेक्षता,समूह-निरपेक्षता एवं रंग-निरपेक्षता आदि सभी से बहुत ऊपर है| ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ को प्रत्येक काल-खंड में, प्रत्येक शाषन व्यवस्था में, यहाँ तक कि प्रत्येक घटने वाले पल में कई प्रकार के प्रहारों से जूझना पड़ा और पड़ रहा है फिर भी इस शब्द की ऊर्जा ना तो कम हुई और न कमजोर पड़ी |

‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ समस्त पूर्वाग्रहों और स्वार्थो से ऊपर वो निरपेक्ष विचार है जो इसके उत्तराधिकारिओ को भू-मंडल पर एक सम्मानजनक स्थान प्रदान करता आया है, विश्व की प्रत्येक ताकतवर शक्ति ने भी इसे उसी रूप में ग्रहण किया है| जिसका परिणाम देश के नागरिकों की विदेशों में महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थापना के रूप में देखा जा सकता है | साथ ही वर्तमान में गीता और रामायण का विश्व के बड़े विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम में शामिल होना ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ को स्वीकारे जाने का अनुपम उदाहरण है |

जो सन्ततियां ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ के संस्कार में सांस ले कर बड़ी हुई हैं वो सापेक्ष कैसे हो सकती हैं ? क्योंकि विश्व-कल्याण तो उन्हें जन्म से विरासत में मिला है, ऐसी संतति के सामने यदि निरपेक्षता के उलटे अर्थ रखे जायेंगे तो व्यंग और जुगुप्सा तो जन्म लेगी ही | जिस सभ्यता की मनोवैज्ञानिक एकता ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ से प्रेरित हो, उसे भटकाने के अर्थों को समझना कोई कठिन कार्य नहीं | या फिर इसे राजनैतिक एकता के मनोवैज्ञानिक एकता पर प्रहार के रूप में भी देखा जाने लगा हो तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी | क्या यही कारण है कि जिसने ‘’ युवा भारत को आक्रोशित ‘’ किया हुआ है ?

या फिर समय आ गया है की देश की राजनैतिक एकता को, देश की मनोवैज्ञानिक एकता से अलग स्वरुप में देखा जाना चाहिए यदि ऐसा हुआ तो राजनैतिक एकता पर एक गंभीर प्रश्न चिन्ह लगेगा जो भविष्य में अप्रत्याशित एवं बड़े परिवर्तनों की आधारशिला रखेगा, क्योंकि मनोवैज्ञानिक एकता तो आत्मा है देश के राजनैतिक एकीकरण की |

‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ ही वो विचार है जो इस देश को अपने स्वर्णिम वैदिक ज्ञान पर एकाधिकार से दूर रख इसे विश्व के कल्याणकारी कारण के रूप में देखता है ना की कुछ धन की लालसा में इसे बंधक बना सीमित करता है | क्या हमने गीता के प्रयोग पर रोयल्टी ली ? वही अगर यह गीता किसी और देश की होती तो क्या वो रोयल्टी नहीं लेता ? वैदिक सभ्यता के निरपेक्ष होने का इस से बड़ा कोई प्रमाण हो तो अवश्य ढूंढा जाना चाहिए और उसे सम्मानित भी किया जाना चाहिए |

या फिर ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ जिसे विश्व अपना रहा है हम उस से दूर जा रहे है मात्र कुछ त्वरित स्वार्थ-पूर्ती की लालसा में सम्पूर्ण जन-मानस को गलत राह दिखा कर ?

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अब तो रहम कीजिये हुजूर गर्दभराज भी मुस्कुराने लगे हैं

“” गर्दभराज को हिंदी साहित्य में सम्माननीय स्थान प्राप्त है “

जिम्मेदारी से लदे शांत वो चले जा रहे थे | आँखों ही आँखों में मुस्कुरा रहे थे ||

पीड़ा जो मुस्कराहट में नजर आ रही थी | सन्देश गर्दभराज का वो दे रही थी ||

’’ पद लूट्यो घर भर्यो नहीं ( ईवीएम बाजीगरी , बूथ कब्जे )

                       धन लूट्यो तब जाय    ( घोटाले पे घोटाले )

                       प्रतिष्ठा अब कैसे बढे

                       सो श्रेय लूट्यो तब जाय ( राहत के नाम तमाशा )

                       सेवा तो मौन्यम भली , कैसी सेवा अब हुई जाय

                       पोस्टर जब तक ना छपे , भाव सेवा को ना आय “

                       हे तथागत ये कैसी माया है जिस में माया के ऊपर माया है

                अंत में……. औन्धे मुह जब तक ना गिरे , अकल कहाँ ते आय |

==श्रेय की लूट , धन की लूट से अधिक अमानवीय और खतरनाक हुआ करती है==

गर्दभराज का एक शेयर का अधिकार तो बनता है | अब तो रहम कीजिये हुजूर गर्दभराज भी मुस्कुराने लगे हैं |

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