हरिद्वार और गंगा

हरिद्वार   और  गंगा  की भक्ति मित्रता ,

इन  दोनों  में  शुद्ध-सात्विक  प्रेम  की  झलक  मुझे  पहले  देखने  को  मिली  थी , लिखते-लिखते  इस  शुद्ध-सात्विक  आलंबन  की  गहराई  धीरे-धीरे  मेरे  सामने  आती  गई , और  मै सम- भाव   की  अवस्था  में  चला  गया , क्योंकि  बिना  सम-भाव  में  जाए  , दोनों  के  मध्य  की  भक्ति-पूर्ण  स्थिति  को  लिखना  संभव  नहीं   था , ऐसे  में  मुझे  सुदामा  व रसखान  के  मनो-भावों  को  समझने   में  मदद  मिली , सात्विक-शुद्ध  प्रेम  की  मूक  अभिव्यक्ति  भी  निर्विकार-पूजा  से  कम  आन्नंन्द  देने  वाली  नहीं  होती ,हरिद्वार   और  गंगा   की  भक्ति-पूर्ण  अवस्था  शब्दों  की  सीमा  के  परे  है ( शब्द वैसे भी सात्विक प्रेम को प्रदर्शित करने में सदैव कमजोर ही रहते हैं ), फिर  भी  कोशिश  कर  रहा  हूँ  और  भक्त व  कृष्ण  के  गरिमामय  मिले-जुले  स्वरुप  की  भक्ति  में  डूब  सा  गया  हूँ . कृष्ण  समझते    हुए  नहीं  समझता  और  भक्त  है  की  किसी  भी  कीमत  पे  कृष्ण  की  भक्ति  में  समाकर कृष्ण को वश में करने का प्रयास छोड़ता ही नहीं . इसे  ही  शायद  मुक्ति  का  न-दिखनेवाला  स्वरुप  कहते  हैं .शायद  यही  वो  पुण्य-कर्म  है  जिसके  लिए  ईश्वर  ने  मुझे  गंगा  और  हरिद्वार के तट पर अनायास ही ला खडा किया है   … हरिद्वार   और  गंगा   के  पवित्र  स्वरुप  की  पूजा  करूँ  निर्विकार  भाव  से ..

हरिद्वार  अपनी  जगह  से  हिलता  नहीं , गंगा  बिना  हरिद्वार  हुए  बह  नहीं  सकती ,हरिद्वार  की  अपनी  मर्यादा  है ,गंगा  का  अपना  कल्याणकारी-प्रेम .अनूठा  संगम  है  मर्यादा  और  प्रेम  का .

जब  गंगा  जादा  परेशान  हो  जाती  है  तो  बाढ़  का  रूप  ले  कर  पूरे  हरिद्वार  को  अपनी  भक्ति  की  चादर  में  लपेट  लेने  की  कोशिश  करती  है  और  हरिद्वार  शांत  और  अविचल-भाव  से  खड़ा  रहता  है , शिकायत  नहीं  करता  क्योंकि   वो  गंगा  की  भक्ति  को  समझता  है , गंगा  धीरे-धीरे  शांत  हो  कर  हरिद्वार  के  मनो-भावों  को  समझती  हुई  फिर  चल  पड़ती  है  आगे  इंसानों  को  पापों  से  मुक्त  करने …और  हरिद्वार  मन  ही  मन  मुस्कुरा  के  गुड -लक  बोलता  है , हरिद्वार  की  अपनी  जिम्मेदारी  है , वो  जनता  है  की  अगर  उसकी  ख़ुशी  गंगा  को  दिख  गई  तो  गंगा  वहीँ   रुक  जाएगी  और  संसार  के  कल्याण  की  जिम्मेदारी  गंगा  पूरी  नहीं  कर  पायेगी …हरी  के  द्वार  पर  आकर  गंगा  कुछ  शांत  हो  जाती  है , प्रेम -योग  से  निकल  कर  गंगा  यहाँ  भक्ति-योग  में  स्थित  हो  जाती  है , और  भक्ति-योग  में  आने  के  बाद  मन  का  शांत  होना  स्वाभाविक  बात  है . जो  गंगा  के  वेग  की  तीव्रता  के  हरिद्वार  में  कम  होने  से  लक्षित  होता  है . गंगा भी समझती है की हरिद्वार से उसकी मित्रता का मान तभी रहेगा जब वो गंगोत्री से प्रतिदिन नूतन जल ला कर हरिद्वार को अर्पित करेगी और हरिद्वार   और  गंगा   दोनों को जो ईश्वरीय आदेश मिला है उसे गंगा को बहते रहकर और हरिद्वार को अविचल रह कर ही पूरा करना है |   … गंगायनमः..हरिद्वाराएनमः

Advertisements

About abhayabhay

love the world and world will love yuo
यह प्रविष्टि Uncategorized में पोस्ट की गई थी। बुकमार्क करें पर्मालिंक

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s