“अहम् के सौन्दर्य का उपादान – निराशा की गर्त में जन मानस”

1.मासूम भोली सी मुस्कान लिये
क्या गुनाह था उस भोली मुस्कान का , क्या खता थी उन मासूम सपनों की,
क्या खता थी उस पिता की , जिसने अरमानो से उसको पाला ,
कैसे माँ वो सह पाती होगी , सोच मात्र हम दहल रहे हैं , देख मात्र हम मरे मरे से
हैवानियत की इस करतूत ने देखो ,तोड़ दिया हर उस पिता को,
जिसके आँगन में एक परी उतारी है , मासूम भोली सी मुस्कान लिये ।

2-” जननी ”
लज्जा लज्जित हो तांडव से गुजरी , नर-भाख्षी भी जिस पर शर्मिन्दा हैं,
तिल-तिल मरती उस माँ को क्या समझें , आंसू भी ना जिसके ज़िंदा हैं,
सृजन की वाहक माँ के प्रश्नों का , उत्तर पुरुष कैसे दे पायेगा ,
क्या जगजननी के आगे , शीश उठा वो पायेगा ,
स्वयं प्राणों से खेल के जो, इस संसार को रचती है,
आज वही कोख को अपनी, पल-पल बददुआ देती है,
लज्जा को लज्जित करना , ये कब से पुरुषोचित कार्य हुआ ,
संवर्धन करे जो जग का , मर्द वही कहलाता है,
छद्दम रूप मर्द का रख कर , जननी को लज्जित करना ,
ये कौन से नियम में आता है

3- वरना त्यागपत्र दे दिया होता, एक मासूम जिंदगी के नाम पर।
झन्नाटेदार थप्पड़ चिपका गए वो, सम्पूर्ण व्यवस्था के गालों पर,
नाक के नीचे कर गए काण्ड जघन्य वो, देते चुनोती सम्पूर्ण व्यवस्था की शान को,
फिर भी देखो साहस है कैसा , हमारे इन माननीयों का,
मुस्कुराकर वक्तव्य दे रहे, मर चुकी मानवता की लाश पर,
अपने झगड़ों में रहते हैं, अपनी मस्ती में वो जीते हैं,
आग लगी देश में पर, अपनी जिम्मेदारी ना कहते हैं,
इस्तीफा ना दिया किसी बात पर, आरोप कह झुठला दिया ,
इस थप्पड़ की गूँज को , अभी भी वो सुन ना पाए हैं,
वरना त्यागपत्र दे दिया होता, एक मासूम जिंदगी के नाम पर।

4-“बेटी ”
बेटी हो तुम सह जाती हो, मुख से कुछ ना कहती हो,
ह्रदय पिता का विदीर्ण ना हो, सदा भाव ये रखती हो,
क्यों सहती हो इतना सब कुछ, मुस्काती हर पल तुम हो,
पिता को कुछ एहसास ना होगा, ऐसा तो ना हो पाता है,
ह्रदय जो अविरल धड़कता तुम है , मेरा ही तो सर्वोत्तम हिस्सा है,
जो सहती प्रतिपल जग में तुम हो, महसूस उसे कर लेता हूँ,
दर्द के सागर पे लहराती , मुस्कान तेरी पढ़ लेता हूँ,
मात्रत्व भाव से पिता को सहेजती , ये भी खूब समझता हूँ,
“बेटी ‘ हूँ मैं पिता तुम्हारा ,कह कुछ भी नहीं पाता हूँ,
दुःख के दारुण भंवर में रह कर , जीवन की रचना करती हो,
नमन मेरा स्वीकार करो तुम, मातृत्व भाव से सज कर तुम
“पिता” को “परी” ही लगती हो।
5-” पिता ”
कैसे सहूँ मैं पिता तुम्हारा , रोकूँ खुद को कैसे मरने से
पग पग रंग भरे अपने सपनों से,बेटी के हर सपने मैं
बेटी होती जान पिता की , मान और अभिमान पिता की,
कहने का ना साहस अब है, जीने की तो बात अलग है
मेहंदी रचे तेरे हाथों में ,सपना होता हर पिता का भर है
वीभत्स प्रलयकारी ये पल है,ज़िंदा हूँ पर मरा हुआ सा
कह नहीं पाता रो नहीं पाता ,मर जाऊं तो मर नहीं पाता
बिखरा बिखरा खुद हो कर भी, सम्भाले जग को तन,मन,धन से
”””

सारी गलती जनता की होती है, चुप से घर नहीं बैठ सकती, जो कुछ हो मुह बंद कर के सह नहीं सकती, क्यों मांग करती है, मांग नहीं पूरी हुई तो बेवजह आन्दोलन ,प्रदर्शन करती है, आंसू गैस तो छोड़ी जायेगी,लाठी तो खानी पड़ेगी, प्रतिनिधि की हैसियत देखे जनता और अपनी हैसियत देखे, इतनी हिम्मत जनता की , कि वो माननीयों से सवाल पूछे,या मिलने कि मांग करे, इस दुस्साहस कि सजा तो मिलेगी जनता को, हर हाल में मिलेगी , क्या जानती है जनता कि देश कैसे चलता है, चली है सलाह देने, अरे एक दो केस हो गए तो क्यों इतना हल्ला मचा रखा , इतने बड़े देश में इतना तो होगा ही, आन्दोलन करना भी है तो अकल होनी चाहिए कि मास्टर माइंड लोग भी हैं जो यग्य को यग्य के समय या बाद में विध्वंस में बदलने कि सलाहियत रखते हैं ,कैसे पार पाओगे … झूठ ही झूठ के इस प्रांगण में सच कि छाया नहीं मिलेगी, अपितु सच को ही झूठ सिद्ध कर दिया जाएगा,चक्रव्यूह झूठ था जिसमें सच का अभिमन्यू सच में वीरगति को प्राप्त हुआ. ज़िंदा रहने कि इच्छा ही जनता कि वो गलती है जो सारे झगडे कि जड़ है,

निराशा का माहौल बनाकर ,प्रगति प्रतिवेदन ना भर पाओगे,
असुरक्षित जीवन देकर कैसे,प्रतिस्पर्धी तुम हो पाओगे,
बातें बड़ी बड़ी बस करते,कम तनिक ना कर पाते,
जिम्मेदारी से बचने की खातिर,कितना भी कुत्सित हो कर जाते,
भाग्य विधाता होने का अहम् तुम्हारा, मानव कब तक ये भुगतेगा,
डरे हुए इतने तुम हो की,अपनी ही आहट से डर जाते,
नीति का हर दामन तुमने,दागों से परिपूर्ण किया,
कैसे भरोसा हो मानव का,झूठ सरासर तुम दे जाते,
अपराधी का महिमा मंडन तुम करते,स्वयं के ईमान से शर्माते,
अपने ही डर की गिरफ्त में रह कर, बहनों पे डंडे बरसाते,
विरोधी देशभक्त को कहते हो,स्वयं के विरोध से डरते हो,
कितने असहाय बेचारे तुम हो, अपना ही द्वन्द न सह पाते,
कुछ मत बोलो मौन रहो तुम,चेहरा सब कुछ कह देता है,
अपनी ही दुर्बलता परोसने का साहस, भला तुम कैसे कर पाते.

“अहम् के सौन्दर्य का उपादान – निराशा की गर्त में जन मानस”
भ्रष्टाचार से पीड़ित देश की आत्मा निवेदन कर के थक गई,परन्तु राजा नन्द खिलखिलाकर हँसता रहा, और देशभक्त चाणक्य स्वरुप जनता को चरण प्रहार के साथ – साथ कठोरतम दंड के विधान के नागपाश में बांधने में कोई कसर नहीं छोड़ी, राजा नन्द की मानसिक अवस्था का प्रभाव उसके कर्मचारिओं पर ना पड़े ऐसा तो असंभव है, जिस राज्य में भी ऐसी अवस्था होती है उस राज्य में दुराचारी स्वयं ही स्वतंत्र हो जाते हैं राजा नन्द के निर्णय को अघोषित नियम मान कर |
ऐसा ही परिलक्षित होने लगा है, मात्र शक्ति को सुरक्षित और संवर्धित ना रख पाने वाला राजा नन्द किस अलंकार का अधिकारी है इसे तो समय ही तय करेगा | परन्तु एक अटल सत्य और है ” जब जब मात्र शक्ति की गरिमा को ठेस लगी है तब तब समय ने युग परिवर्तन का संकेत दिया है, जैसे द्रोपदी के चीर हरण ने महाभारत को अंजाम दिया और सीता हरण ने रावन के विनाश की उदघोषणा की , परन्तुं अहम् के सौन्दर्य में मदमस्त सत्ता सदैव इन संकेतों को कपोलकल्पित कल्पना ही कहती है जो की मदमस्त सत्ता का ऐसा अन्तर्निहित गुण है जो की वर्णन ना किया जा सकने वाला सत्य है, हिंदी सभ्यता के सर्वोच्च रचनाकार गोस्वामी तुलसी दास जी भी ऐसे स्थिति को कलम की असफलता मान कर लिखते हैं ” यश अपयश विधि हाथ ” |
कलम जब जब स्थितिओं को सही दिशा देने में असमर्थ हुई हुई है तब तब कलम ने होने वाली घटना को ” विधि हाथ ” ही लिखा है,कलम क्या करे मजबूर हो कर सब कुछ विधि हाथ लिख कर अपने कर्म को परिभाषित करने से कलम अपना दायित्व पूरा कर जाती है|
दुराचार होने पर अपनी असहाय स्थिति का रोना रोना और दुःख संताप से पीड़ित आम इंसान पर सत्ता की सम्पूर्ण ताकत का प्रयोग सम्पूर्ण जनमानस को ” निराशा के गहरे गर्त में नहीं धकेलेगा ” ऐसा यदि कोई सोचे तो इसे तुलसी दास जी के शब्दों में ”” ताहि प्रभु दारुण दुःख देहीं,ताकि मति पहले हर लेहीं ” लिख कर ही व्यक्त किया जा सकता है , कलम की असफलता यहाँ भी दिख रही है,|
प्रश्न है ” निराशा के इस गर्त से आवाज क्या उठाने वाली है ” निश्चय ही निराशा का गर्त कभी भी आशावादी नारा नहीं देता, निराशा के इस गर्त के व्यापक परिणाम होते हैं जो किसी भी देश को सम्पूर्ण कीमत दे कर चुकाने पड़ते है, क्या ये कीमत दे कर ही सीखने का निश्चय राजा नन्द ने कर लिया है.????????

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