‘’ जींस और स्कर्ट से परिभाषित होती योग्यता ‘’ ?

 

लीजिये फिर उछाल दिए गए जुमले पे जुमले की बाँध को …… से भर दें क्या ,

एक कंपनी ने फरमान जारी कर दिया जींस और स्कर्ट का , पंगा तो होना था सो मोहतरमा ने चिपका दिया झन्नाटेदार थप्पड़  न्यायालय में जा कर (सही कदम सही वक्त पर उठाते हुए ) .. कई बार सोचता हूँ वैसे तो बड़े अकल्मन्द बनते हैं उल-जलूल नियमों के निर्माता, पर थप्पड़ खाए बिना ये भी नहीं मानते , क्या अंतर है मय में धुत्त सड़क पे पड़े पियक्कड़ में और इन में , या फिर जीन्स और स्कर्ट की बिक्री का भी कोई दांव है, एलोपेथी की वितरण प्रणाली की तरह …..हद है जीन्स और स्कर्ट में योग्यता ढूंढी जा रही है ? फिर तो उनकी योग्यता तो सदैव प्रश्न ही रहेगी जिन्होंने जिंदगी भर ये ध्यान नहीं रहा की कोन से कपडे पहने जाने हैं और इसी अनिभिग्यता के सहारे उन्होंने अपने आप को महा-मानव बना दिया . धन्य है ये कार बनाते हैं  अन्यथा जाने कैसा ड्रेस-कोड लागू करते … राधे –राधे राम मिला दे अब तो ..

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