‘’ किस काबिल हैं हम “

                                 

सुना था ज्ञान शक्ति देता है , समझ देता है , सरोकार देता है परन्तु पिछले कुछ वर्षों में होने वाली दुखद घटनाओं ने एक प्रश्न दिया है जिसे समाज को स्वीकारना होगा और समाधान हासिल करने होंगे अन्यथा भविष्य के संकेत शुभ नहीं होने वाले | सर्वप्रथम गर्भ में आकार लेने से पहले ही जीव का भाग्य तय करना बंद करना ही होगा अन्यथा सर्वनाश कर ज्ञान प्राप्त करने की आदत आँसू के अलावा कुछ भी दे कर नहीं जायेगी |

गर्भ में ही जीव पर इतना भार डाल दिया जाता है की वो जन्म लेने से पूर्व सोचने पर मजबूर हो जाता है कि हे भगवान् क्यों भेज दिया इस विचित्र चिड़ियाघर में | माँ के विचारों का प्रभाव गर्भ में पलते जीव पर पड़ता ही है यह तो जग जाहिर सत्य है , परिवार की असीमित काल्पनिक आकांक्षाओं के बोझ को अपने जहाँ में समेटे हुए माँ जब जीव को जन्म देगी तो असर तो पड़ना ही है |  नाभिकीय परिवार श्रंखला ने इन असीमित काल्पनिक आकांक्षाओं का आकार ब्रह्माण्ड से बड़ा कर दिया है अब एक नन्हा जीव सहे तो सहे कैसे , कहे तो कहे कैसे , उस घुटते हुए जीव के प्राणों का क्रंदन कोई सुने भी तो सुने कैसे क्योंकि इन सब की मनाही तो असीमित काल्पनिक आकांक्षाओं के बोझ तले जाने दबा के कब की कर दी गई | माँ-बाप का अधिकार भविष्य देने का है, संस्कार देने का है या लोहे के फ्रेम में कस कर बाँध कर लकड़ी के सीधे फ्रेम को और सीधा करने का ?

रही बात रोजगार की तो क्या हम माँ-बाप इतने भी काबिल नहीं की अपनी संतति को नौकरी कर रोजगार प्राप्त करने के सिवा कोई अन्य विकल्प ना दें पायें | नौकरी ही एक ऐसा विकल्प क्यों हो गया है जो सर्वोत्तम पद प्राप्त कर चुका है ?

उत्तम खेती , मध्यम बान ,

अधम चाकरी , भीख निदान  तो सुना था परन्तु हजारों वर्षों के इस शोध को हमारी अत्यधिक अकलमंदी ने कचरे के डिब्बे में कब का फेंक दिया | स्वरोजगार सम्माननीय क्यों नहीं है भाई ?

अपने रुचिपूर्ण कार्य को या विरासत में सम्मान सहित मिले कार्य को रोजगार के रूप में अपनान कौन सा पाप है ?

नहीं पर दिमाग में तो एक विचार ने ऐसा घर बना लिया है की ‘’ प्रथम पद से कम कुछ नहीं और पैकेज वाली नौकरी से कम कुछ नहीं ‘’ | कोई भी उद्योगपति, उद्योग क्या इस भाव से लगाएगा की उसे असीमित काल्पनिक आकांक्षाओं के स्वामिओं की संतानों को नौकरी देनी है या उसे लाभ कमाना है | शिक्षित करना अलग बात है शिक्षित हो कर फन्नेखां बनने का सपना अलग बात और जीवन जीना इन सब से दूर की विधा | सलाखों की कैद से बड़ी अधिरोपित विचारों की कैद होती है, हम ज्ञानी माँ-बाप कब इस सत्य को पहचान पायंगे की जिन्हें हम अपनी जान से जादा प्यार करते हैं उन्हें ही हमने गर्भ में आने से पहले से ही उस कैद में कैद कर देते है जो सलाखों की कैद से भी जादा भयंकर , दारुण और कष्ट देने वाली है | हवा-धूप-पानी से दूर रखने से ना तो पेड़ पौधे ही बड़े होते हैं और ना ही कोई मासूम बचपन जिम्मेदार नागरिक की शक्ल ले पाता है | मेरा बेटा या बेटी  बहुत बड़े पद पर है कहना बहुत सुहावना है पर कभी बेटे या बेटी से एक प्रश्न पूछने का साहस क्या हम में बचा है  ..

इस पद को प्राप्त करने में मासूम बचपन ने कितनी खुशिओं से किनारा कर लिया ? या फिर उत्तर हम जानते हैं इसीलिए यह प्रश्न नहीं कर पाते , असीमित काल्पनिक आकांक्षाओं

के स्वामिओं की सोच की सजा ‘’ मासूम बचपन ‘’ को क्यों ?

प्रत्येक जीव में एक असाधारण प्रतिभा होती है बजाय उस प्रतिभा का हमसफ़र बनने के हम कही उसकी ब्रांडिंग जबरियन तो नहीं कर रहे ? ब्रांडिंग तो विक्रय की जानेवाली वस्तुओं की हुआ करती है जीव की नहीं क्योंकि जीव तो स्वयं में ब्रांड का अधिष्ठाता है |

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