‘’ महिला न्यायाधीश दहेज़ की दहलीज पर “

‘’ महिला न्यायाधीश दहेज़ की दहलीज पर “

मुख्य पृष्ठ दैनिक भास्कर के सानिध्य से —

इतनी अधिक स्वीकार्यता है दहेज़ की तो क्यों ना इसे नियमान्तर्गत मान्यता मिले , रेट लिस्ट बने , रजिस्ट्री हो जैसे जमीन की होती है जिस से दहेज़ की व्यवस्था कर बेटी की जिंदगी सुनिश्चित की जा सके और बैंक पालिसी में बदलाव कर ‘’ दहेज़ हेतु लोन ‘’ आकर्षक किश्तों में उपलब्ध हो सके | जिस से  व्यक्ति भ्रष्टाचार के माध्यम से बचने की कोशिश कर सकता है , पिता और बेटी आत्महत्या से दूर होंगे , दहेज़ ना मिलाने के डर से रक्तचाप बभी ना बढेगा , बैंक का कारोबार बढेगा, जी.डी.पी बढेगा , पुलिस और न्यायालय पर जबरियन का बोझ कम होगा , दहेज़ आधारित विवाहों से उत्पन्न माँ-बाप के झगड़े से मासूम बच्चों को राहत मिलेगी , समाज संतुष्ट रहेगा की सरकारी रेट फिक्स है तो दहेज़ तो मिलेगा ही जिस से दहेज़ षड्यंत्रों में लगाया जाने वाला समय किसी सृजनात्मक कार्य में लगाने की जगह भी बन सकती है | दहेज़ लिए बिना मानेगे तो है नहीं फिर सार्वजनिक स्वीकार्यता क्यों नहीं ? जो इस प्रस्ताव से सहमत ना हों वे अवश्य प्रतिक्रया देने का कष्ट करें |

सम्पूर्ण स्वीकार्यता या सम्पूर्ण अस्वीकार्यता से सम्पूर्ण निर्णय संभव होता है जो समाज को संतुष्ट रखता है , दहेज़ के सम्बन्ध में सम्पूर्ण स्वीकार्यता या सम्पूर्ण अस्वीकार्यता से सम्पूर्ण निर्णय लेने में क्या समस्या है या हमारा डर लोकलाज को लेकर ,यदि ऐसा है तो दहेज़ की प्रथा को तिलांजलि क्यों नहीं ? खाना खायेंगे भी और नहीं भी खायेंगे पर पेट भरना चाहिए .. हद है कद्दूपने की |

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