‘’ सत्य सार्वभौमिकता का या अहम् व्यक्तिवाद का ’’

ज्ञान की धरा के नाम से संबोधित होने वाली धरा किस तरह ‘’ व्यक्तिगत लालच एवं वीभत्स आचरण ‘’ का पर्याय बनती गई , कहाँ कमी रही या कहाँ इसे रोकने में हम सफल ना हुए या व्यक्तिगत आकांक्षा के काल्पनिक आकाश ने हमारे वास्तविक होने के समस्त आग्रह हम से एक एक कर के दूर कर दिए अथवा स्थूल जीवन शैली के अमर्यादित तांडव ने हम में ही एक अवकाश का निर्माण कर दिया जिसे अविलम्ब भरने में हमारे अहम् ने सक्रीय भूमिका निभाते हुए हम से हमारा अस्तित्व ही अलग कर दिया | योग्यता के मापदंड जब-जब सीमित किये जाते हैं तब-तब योग्यता कुंठित हो उश्रिन्खल व्यवहार करने लगती है , पता तब चलता है जब अपने ही द्वारा निर्मित सर्वनाश हमें ही काल-कवलित करने लगता है | शिक्षा प्रणाली में जो परिवर्तन पिछले 20 वर्षों में हुए उन पर सूक्ष्म दृष्टिपात नितांत आवश्यक है , इस शिक्षा प्रणाली का सबसे बड़ा दोष यह रहा की इसने गुरु को मात्र एक वेतनभोगी के रूप में प्रस्तुत किया , तदनुसार गुरु भी उसी धारा के अनुगामी हो गए | एक घटना मुझे सदैव याद रहती है जब एक समागम में मेरे मित्र ने अपने गुरु के सम्बन्ध में की गई टिपण्णी पर जवाब दिया था ‘’ NO  DOUBT  HE  IS SIMPLY  A  TEACHER  BUT  IT  IS  THE  BIG  TRUTH,  THAT  AACHAARY  IS  SIMPLY  A  GREAT  PERSON “ |

राजनीति की भी अन्य बातों की तरह एक सीमा होती है , किसी भी मानव समुदाय में ‘’ यथार्थ जीवंत एकता ‘’ की स्थापना कदापि राजनैतिक कार्य नहीं है परन्तु पिछले बीते समय को देखें तो साफ़ दिखेगा की प्रचुर मात्रा में ऐसा हुआ और ऐसा होने का कारण प्रजातंत्र की कमिओं में कहीं ना कहीं अवश्य दिख जायेंगे   ‘’ प्रजातंत्र में किसी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी ‘’ तय करना लगभग असंभव कार्य है, से ये बात पूर्णत: स्पष्ट जायेगी | राजनैतिक एकता और यथार्थ जीवंत एकता दो  परस्पर भिन्न बातें हैं , भारतवर्ष की ‘’ यथार्थ जीवंत एकता ’’ अनुपम और अद्वितीय है अतः सारे आघात सह कर देश के साम्राज्य स्वरुप को सदैव बचाए रखती है ना की राजनैतिक एकता के आधार पर निर्मित देश ‘’ आस्ट्रिया ‘’ जैसे विशाल साम्राज्य को खंड-खंड होने से रोक नहीं पाती | राजनैतिक एकता एक तात्कालिक उपचार है जबकि ‘’ यथार्थ जीवंत एकता ’’ मानव समूह का एक ईश्वर प्रदत्त सर्वकालिक गुण |

‘’ यथार्थ जीवंत एकता ’’  नैतिक, आध्यात्मिक विचार धारा की भूमि पर आर्थिक, राजनैतिक , और प्रशासकीय एकीकरण की ऊर्जा से पल्लवित होती है जबकि राजनैतिक एकता अपनी ही धुरी पर अपनी ही परिक्रमा करने वाले उपग्रह की तरह व्यवहार करती है | इसका आध्यत्मिक, नैतिक, आर्थिक, प्रशासकीय जैसे ‘’ यथार्थ जीवंत एकता ’’ के प्रमुख कारणों से कोई लेना-देना नहीं होता और कुछ समय बाद यह एक निरंकुश शाषक की तरह व्यवहार करते हुए कब राजतंत्र की तरह व्यवहार करने लग पड़ती है इसका आभास स्वयं राजनीति को भी नहीं हो पाता |

१९०८ में अंग्रेज सरकार ने कहा था की सारे क्रान्तिकारिओन को जेल में डाल दें और श्री अरविन्द घोष को आजाद छोड़ दिया जाए तो वह क्रान्तिकारिओन की एक नई फौज कुछ ही  महीनो में ही खड़ी कर सकता है , अफ़सोस किसी भी शिक्षा प्रणाली पाठ्यक्रम में यह विवरण नहीं है 

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