‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ जिसे विश्व अपना रहा है हम उस से दूर जा रहे है मात्र कुछ त्वरित स्वार्थ-पूर्ती की लालसा में सम्पूर्ण जन-मानस को गलत राह दिखा कर ?

‘’सीमित होती निरपेक्षता और भारत का सम्मान ‘’

भारतवर्ष को सम्मान सदैव उसके ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ के विचार को प्रचारित एवं तदनुसार जीवन में उतारने के कारण मिला है, इस सम्मान का दूसरा दारुण पक्ष यह भी की सदियों से विश्व ने भारत-भूमि का प्रयोग विभिन्न विचारों के प्रतिपादन एवं स्थापन में एक प्रयोगशाला के रूप में किया और कर रहा है | सैकड़ों सालों के असंख्य प्रयोगों के उपरांत भी ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ का सर्वोच्च निरपेक्ष विचार जन-मानस में वैसा का वैसा ही है , इस विचार की सर्वग्राहिता ही वह अन्तर्निहित ताकत है जो वैदिक सभ्यता को आज भी विश्व के मानचित्र पर उसी तीव्रता से प्रदर्शित कर रही है, जबकि ऐसे कुछ वर्षों के प्रयोग के बाद ‘’रोम’’ जैसे विशाल राज्य की सत्ता अंतिम समय में केंद्र में सिमट समाप्त हो गई और रोम की विशाल सत्ता का नामो-निशाँ एक दर्दनाक कहानी के रूप में इतिहास के पन्नो में दर्ज हो गया |

समय शायद यही कह रहा है कि निरपेक्षता की सीमित हो चुकी परिभाषा को अब समाप्त हो ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ की सर्वव्यापी , सर्वकल्याणकारी परिभाषा को स्थापित होना है | केवल कुछ लाभों की प्राप्ति भर के लिए मूल सिद्धांतों में तोड़-फोड़ सदैव से होती आई है और भारतीय जन मानस ने समस्त पूर्वाग्रहों से दूर जा कर ‘’ भारतीयता ‘’ को सदैव स्थापित भी किया है , परन्तु इतिहास और समय कभी भी मूल नैसर्गिक सिद्धांतों से तोड़-फोड़ करनेवालों को माफ़ नहीं करता , शायद यही वजह रही जिसने सिकंदर को अंत समय में अहसास दिलाकर मजबूर कर दिया की वो अंतिम सन्देश मूल नैसर्गिक सिद्धांतों की परिभाषा के अंतर्गत दे कर दुनिया से विदा ले |

परन्तु प्रश्न यह है की सिकंदर का अंतिम सन्देश भुला कर अहमक-निर्णयों में उस से भी आगे निकला जा चुका है क्या ?

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‘’निरपेक्षता के बदलते अर्थों ने क्या इसके नए वर्गीकरण की आधारशिला रख दी है “?

वैदिक साहित्य की पृष्ठभूमि में जितने भी लेखकों ने लिखा, चाहे वो स्वदेशी हो या विदेशी सब ने वैदिक विचारधारा के ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ को सदैव सम्मानित पद दे कर रेखांकित किया है | यह वो शब्द है जो विचारधारा के उस सम्पूर्ण स्वरुप को आकार देता है जो धर्म-निरपेक्षता,क्षेत्र-निरपेक्षता,समूह-निरपेक्षता एवं रंग-निरपेक्षता आदि सभी से बहुत ऊपर है| ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ को प्रत्येक काल-खंड में, प्रत्येक शाषन व्यवस्था में, यहाँ तक कि प्रत्येक घटने वाले पल में कई प्रकार के प्रहारों से जूझना पड़ा और पड़ रहा है फिर भी इस शब्द की ऊर्जा ना तो कम हुई और न कमजोर पड़ी |

‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ समस्त पूर्वाग्रहों और स्वार्थो से ऊपर वो निरपेक्ष विचार है जो इसके उत्तराधिकारिओ को भू-मंडल पर एक सम्मानजनक स्थान प्रदान करता आया है, विश्व की प्रत्येक ताकतवर शक्ति ने भी इसे उसी रूप में ग्रहण किया है| जिसका परिणाम देश के नागरिकों की विदेशों में महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थापना के रूप में देखा जा सकता है | साथ ही वर्तमान में गीता और रामायण का विश्व के बड़े विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम में शामिल होना ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ को स्वीकारे जाने का अनुपम उदाहरण है |

जो सन्ततियां ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ के संस्कार में सांस ले कर बड़ी हुई हैं वो सापेक्ष कैसे हो सकती हैं ? क्योंकि विश्व-कल्याण तो उन्हें जन्म से विरासत में मिला है, ऐसी संतति के सामने यदि निरपेक्षता के उलटे अर्थ रखे जायेंगे तो व्यंग और जुगुप्सा तो जन्म लेगी ही | जिस सभ्यता की मनोवैज्ञानिक एकता ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ से प्रेरित हो, उसे भटकाने के अर्थों को समझना कोई कठिन कार्य नहीं | या फिर इसे राजनैतिक एकता के मनोवैज्ञानिक एकता पर प्रहार के रूप में भी देखा जाने लगा हो तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी | क्या यही कारण है कि जिसने ‘’ युवा भारत को आक्रोशित ‘’ किया हुआ है ?

या फिर समय आ गया है की देश की राजनैतिक एकता को, देश की मनोवैज्ञानिक एकता से अलग स्वरुप में देखा जाना चाहिए यदि ऐसा हुआ तो राजनैतिक एकता पर एक गंभीर प्रश्न चिन्ह लगेगा जो भविष्य में अप्रत्याशित एवं बड़े परिवर्तनों की आधारशिला रखेगा, क्योंकि मनोवैज्ञानिक एकता तो आत्मा है देश के राजनैतिक एकीकरण की |

‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ ही वो विचार है जो इस देश को अपने स्वर्णिम वैदिक ज्ञान पर एकाधिकार से दूर रख इसे विश्व के कल्याणकारी कारण के रूप में देखता है ना की कुछ धन की लालसा में इसे बंधक बना सीमित करता है | क्या हमने गीता के प्रयोग पर रोयल्टी ली ? वही अगर यह गीता किसी और देश की होती तो क्या वो रोयल्टी नहीं लेता ? वैदिक सभ्यता के निरपेक्ष होने का इस से बड़ा कोई प्रमाण हो तो अवश्य ढूंढा जाना चाहिए और उसे सम्मानित भी किया जाना चाहिए |

या फिर ‘’ वसुधेव कुटुम्बकम ’’ जिसे विश्व अपना रहा है हम उस से दूर जा रहे है मात्र कुछ त्वरित स्वार्थ-पूर्ती की लालसा में सम्पूर्ण जन-मानस को गलत राह दिखा कर ?

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