धन्यवाद : उन्होंने हमें अपनी लाश अपने कन्धों पर रख कर चलना जो सिखा दिया |

’’’ जाइए हमें आप से कोई शिकायत नहीं “”

काल-कवलित हजारों हो गए , जाने कितना तड़प

जिंदगी से मेरी एक झटके में, जुदा वो मुझ से हो गए ,

लाशें भी कराहीं अंतिम संस्कार को , जिम्मेदार संवेदनशील कुछ इस तरह हो गए

कह भी ना पाए वो….. ,

यह राष्ट्रीय नहीं मानवीय शोक है , मानवता पर आपदा राष्ट्रीय आपदा से बड़ी

शोक पर राज-मुहर के प्रतिबिम्बन को भि खारिज वो कर गए ?

ये तेरा शोक और मेरा शोक है , आओ हम मिल के दुःख बांटे स्वयं

रहें वो महलों में अपने समीकरणों में अड़े , दुआ है नींद में ना उनकी खलल कोई पड़े .

उनकी मय्यतों को सजाते जो रहे , दो गज कफ़न भी ना वो उन्हें दे सके 

धन्यवाद : उन्होंने हमें अपनी लाश अपने कन्धों पर रख कर चलना जो सिखा दिया |

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‘’ प्रतिष्ठा , प्रतिष्ठा ,और प्रतिष्ठा ‘’

‘’ प्रतिष्ठा , प्रतिष्ठा ,और प्रतिष्ठा ‘’

इस पूंजीवादी युग में केवल प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए कुछ भी करना जायज सा होता जा रहा है| सामाजिक,पारिवारिक यहाँ तक की व्यक्तिगत उन्नति के वो सारे नियम जो बनाए थे उन्हें अपने ही पैरों तले  कुचल कर उनका मजाक उड़ाने के लिए चारित्रिक अनावरण को प्रत्येक स्तर पर सही ठहराने का कोई भी प्रयास छोड़ा नहीं जा रहा , क्योंकि प्रतिष्ठित पद प्राप्त करना है |

पद से प्रतिष्ठित होना और प्रतिष्ठित हो कर पदासीन होना दो अलग-अलग बातें हैं |

बड़ी अजीब बात है पद तो प्रतिष्ठित हो गया पर आचरण ?

परदे के पीछे चारत्रिक अनावरण किस हद तक हुआ उसे देख कर ऐसा लगता है कि व्यक्ति और समाज नाम की अवधारना का कोई औचित्य बचा भी है की नहीं ?

क्योंकि स्वयं के सम्पूर्ण अनावरण के उपरांत पद प्राप्त करना स्वयं में वो शक्तिशाली सन्देश है जो सिद्ध करता है कि व्यक्ति की प्रतिष्ठित पद की लालसा स्वयं की खोखली प्रतिष्ठा से प्रतिष्ठित करना मात्र है ना कि समाज सेवा का कोई अनुग्रह है ऐसे में समाज की अवधारना का ओचित्य अर्थहीन क्यों ना हो ?

प्रत्येक व्यक्ति जानता है की परदे के पीछे कैसे इन पदों की बोली लगाईं जाती है और व्यक्तिगत लाभ-हानि जोड़ा जाता है ,जो सर्वविदित और सर्वव्यापी है उसे परदे के पीछे रखने से अच्छा है कि इनकी खुली-निविदा क्यों ना आमंत्रित की जाय और जो राशि मिले उसे सामाज के गरीब नागरिकों की दशा सुधारने में लगाया जाय ?

सर्वविदित सत्य है कि खुली नालिओं में बहने वाली गन्दगी की जहरीली गैस वायुमंडल में घुल कर कम जहरीली हुआ करती हैं , वहीँ बंद ड्रेनेज पद्धति में एकत्र जहरीली गैसें हंसते-खेलते जीवन को पल भर में काल-कवलित करने का सामर्थ्य रखती हैं |

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‘’रावण’’ तू क्यों शर्माता है ?

फिर ‘’रावण’’ तू क्यों शर्माता है ?

दामिनी जब भी दारुण दुःख से गुजरे , विकल मन क्यों होता है ?

सड़ती लाशें देव-भूमि में , ह्रदय बंद क्यों होता है ?

चिपके पेटों से जा कर पूछो तो , दर्द समेट मुस्काता है

नंगे तन से लाज को ढँक कर , वो गरीब सो जाता है

उसकी रोटी का जो मोल लगाया , उस पर भी वो हँसता है

दुखी ना होना मोल लगाने वालों , ऐसा ही कुछ वो कहता है

कलयुग की यह दशा देख कर , ‘’रावण’’ खुद से पूछ ही लेता है

मानव जब है मानवता का प्रहरी , फिर ‘’रावण’’ तू क्यों शर्माता है ?

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गुस्से में जब कुछ याद आ गया , कागज़ को सजा दे दी यूँ ही हमने

कोई अगर ये सोचे कि वो , भारतीयों की किस्मत में केवल ‘’ श्रद्धांजलि ‘’देना  लिख सकता है तो वो एकदम गलत सोचता है |

सर्वस्व लुटाने वाला , लुटेरों से सदैव श्रेष्ठ रहा है और रहेगा |

            जय जवानजय किसान        

 

 

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कार्यपालिका में ईमानदार कर्मचारिओं को संविधान के अंतर्गत दी गई स्वतन्त्रता से कार्य ना करने देने के कारण ‘’सकल घरेलू उत्पाद’’ एवं ‘’राजकोषीय घाटे’’ पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव की गणना क्या देश की आर्थिक सेहत को देखते हुए नहीं करनी चाहिए या फिर ‘’ कर आरोपण ‘’ ही एकमात्र विकल्प मान लिया गया है , यदि ऐसा है तो ?……. जय जय सीताराम   #Durgashaktiincreasedcollection

abhay

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देश ने हम पर कितने अहसान किये हैं जिस पल हम यह अहसास कर लेते हैं

उस पल कहा गया ‘’ वन्देमातरम ‘’ स्वयं सार्थक सिद्ध हो जयघोष बन जाता है और अनजाने में हमें ‘’सम्पूर्ण देशभक्त’’ की उपाधि दे जाता है |

abhay

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आज जो ‘’बाबा गोपाल दास’’ के आन्दोलन पर मौन समाधि में हैं , कल वे ही बड़ीबड़ी शोध पुस्तकें लिख कर

‘’नोबल पुरूस्कार ‘’

हेतु ग्लोबल वार्मिंग पर चिंता व्यक्त करेंगे |

और क्या इस से अधिक चतुर! अंतरिक्ष से पालतूपशु आयात की प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाकर बुद्धिमान होने का दावा प्रस्तुत करने के साथ उदरपूर्ति का शषक्त माध्यम तलाशेंगे ?

जय हो बाबा गोपाल दस जी हर हाल में कल्याण करके संतत्व ही सिद्ध करेंगे आप  , आखिर संत जो ठहरे

संत तो भलाई के लिए जन्म लेते है        abhay

 

 

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छुपता कुछ भी नहीं जहां में , क्यों इस कदर मरे जा रहे हो .. कुकर्मों की सजा मिलना तो तय है , दीवाने से क्यों हुए जा रहे हो ?#partyagainstRTI

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पिता ने ही थमाई थी वो सारी किताबें, जिनमे विवेकानंद मिले और दर्शन गांधी के हुए हैं

बर्नाड हों या हों सी.बी रमण , सब के बारे में पिता ने ही तो बताया

पिता कभी मेरे स्वरुप से अलग ही नहीं हैं , प्रतिबिम्ब तो में स्वयं हूँ पिता का

नाती में स्वरुप अपना निर्मित है करते , नाती को बाबा कथा प्रताप की है सुनाते

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? बहुत आज तुम मुस्कुरा रहे हो, क्या बात है जो छुपा रहे हो ?

भाव टमाटर या पेट्रोल का बढे तो ,

कारण धर्म-निरपेक्षता  का बताते |

बारिश हो या हवा चल पड़े तो,

धर्म-निरपेक्षता कह दामन अपना बचाते  ||

धर्म-निरपेक्षता को वो क्यों अपमानित हैं करते ?

जो खुद को ‘’प्रहरी’’ धर्म-निरपेक्षता का बताते |

‘’आवाम’’ तो हमेशा धर्म-निरपेक्ष ही है रहती ,

क्यों गुनाहगार वो ‘’आवाम’’ को बताते ? #दुर्गाशक्ति

 

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हाँ हम मरने आते हैं, हाँ हम मिटने आते हैं

हाँ हम मरने आते हैं, हाँ हम मिटने आते हैं

लिप्सा भोग के गुलाम नहीं हम, सर्वस्व लुटाने आते हैं

तुम तो ठहरे निर्भर वोटों पर, हम स्वाभिमान सजाने आते हैं

कसम तुम्हे मत सजदा करना मेरा , कलंकित ना मेरी मट्टी को करना

देश-प्रेम से भरा देश बहुत है , मेरी याद में दिये जलाने को |

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‘’ निकृष्ट कहे गए कर्म सोने की खदान “

‘’ निकृष्ट कहे गए कर्म सोने की खदान “

कर्म और कर्म के प्रकार , किसी ने कहा है ‘’ विहित कर्म से विमुख का सर्वनाश तय है ‘’ बहुत अधिक समय नहीं हुआ जब कुछ कार्यों को निकृष्ट कहा गया और उनके कर्ता को तदनुसार लक्षित किया गया , मात्र 20 वर्षों में उन्ही निकृष्ट कर्मों का कर्ता आज धनवान हो कर सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर गया |

विहित कर्म, जिसमे मै दक्ष हूँ कैसे मुझे सम्मान नहीं दिलवाएगा ?

मेरा विहित कर्म जब किसी को ख़ुशी दे तो तय है की वो मुझे सम्मान ही दिलवाएगा परन्तु इसके उल्टे प्रचार-प्रसार ने देश के जन मानस की दिशा-दशा दोनों बदल कर काफी हद तक परावलम्बी बनने की एक मजबूत आधारशिला रख दी और स्वावलंबी जन-मानस को मानसिक दासता में जकड़ दिया | आज वही समाधान स्वयं में समस्या बन विकराल रूप में सामने खड़ा है |

प्रत्येक वह कर्म जो इंसानी जिंदगी को सहूलियत दे निकृष्ट कैसे हो सकता है ?

इस बात को स्थापित करने के बजाय उक्त कर्म के कर्ता को निकृष्ट सिद्ध किया जाता रहा और आज उसी निकृष्ट कर्म के करोड़ों के ठेके दिए जा रहे हैं जिसे करने में समाज के किसी वर्ग को कोई हीन भावना महसूस नहीं होती क्योंकि रोजगार प्राथमिकता जो बनाता गया |

श्री अरविन्द घोष की पुस्तक ‘’ मानव-एकता का आदर्श “ के पहले के पन्नों पर ‘’ पूर्ण-व्यक्ति’’ व ‘’ पूर्ण-समाज’’ पर ही अटक कर रह गया हूँ सोचता हूँ तो एक ही सवाल सामने है “ कर्म को निकृष्ट सिद्ध कर के मानव को निकृष्ट ’’ सिद्ध क्यों किया गया जो की बुनियादी रूप से गलत बात है | श्री अरविन्द घोष को ध्यान में रखते हुए यदि पूर्ण-व्यक्ति की परिभाषा से उसके द्वारा किये प्रत्येक सकारात्मक कर्म को यदि श्रेष्ठ सिद्ध किया जाता तो एक कालजई समाधान मिलता और वर्ग-संघर्ष कब का समाप्त हो गया होता और ना ही किसी वर्ग में हीन भावना का विकास ही हुआ होता | व्यक्ति का समर्पण उसके कार्य को सफलता देता है जो उसे श्रेष्ठ साबित करता है | आज वही फेंका हुआ कर्म दूसरे इंसान ही तो कर रहे हैं और वे श्रेष्ठ हैं पहले इसी कर्म का कर्ता निकृष्ट कहा गया |

क्या कहीं कोई भयंकर भूल हुई है नागरिकों के आत्मबल के निर्माण में यदि हाँ तो कीमत तो चुकानी है और जो शायद चुकाई भी जा रही है | बात व्यक्ति को स्वयं में सम्पूर्ण और सक्षम सिद्ध करने की होती है ना कि कर्म से विमुखता का रास्ता दिखा कर उसके सर्वनाश का मार्ग प्रशस्त कर एक दीर्घकालिक समस्या को जन्म देने की |

पूर्वाग्रह से ग्रस्त लेख की संज्ञा दी जा सकती है इन पंक्तिओं को परन्तु एक बात अवश्य ध्यान दीजिये की कर्म वही है आज का कर्ता धनवान है पर 20 वर्ष पहले इसी कर्म का करता गरीब हुआ करता था , पहले इन्ही कर्मो के सम्पादन में सम्मान नहीं था परन्तु आज यह स्वावलंबन की परिभाषा में समाहित है और प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति बिना किसी हीन भावना के ख़ुशी से कर रहा है |

 

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हमें क्या चाहिए ?

हमें क्या चाहिए ?

‘’ अनुदान ‘’ ?

 ‘’ खैरात ‘’ ?

  या ‘’ रोजगार ‘’ ?

अनुदानों पर जीवन जो पलते धरा पर, समृद्ध ना वो कभी करते जगत को |

अनुदान प्राप्त करना या दयावश अनुग्रह प्राप्त करना स्वाभिमान को खा जाया करता है यदि ऐसा ना होता तो ‘’ खुद्दारी ’’ जैसा शब्द शब्दकोष में होता ही नहीं | ये बात अलग है कि ‘’ अनुदान ‘’ प्राप्त करना मात्र को ही ‘’ खुद्दारी ’’ मान लिया गया हो ?

कोई भी समाज अपनी समझ, जीजिविशा, दया, करुणा , की भूमि पर जब आत्मविश्वास से खड़ा होता है तब ही वो सही मायनों में प्रगति प्रतिवेदन को सार्थक कर पाता है |

 ‘’ अनुदान ‘’ प्राप्त करने के भाव से ..’’ बेचारा ’’ बन के जीना, शायद शान से जीने का पर्याप तो नहीं बनता जा रहा या ‘’ बेचारा ‘’ होने की कैद स्वयं चुन ली गई  ? या लालच अनुदान का ,जीने नहीं देता ?

नोट:- उपरोक्त पंक्तियाँ एक बुजुर्ग किसान के भावों पर आधारित हैं , जिनका अक्षर-ज्ञान हस्ताक्षर करने की सीमा तक सीमित था|

 

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